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आसरा न दरख़्त साया न घर है कोई,
न मंजिल न सफर न रहबर है कोई।

न जीने की तम्मना न मरने इरादा ही है,
ज़िन्दगी के इधर है कोई न मौत के उधर है कोई।

पड़ा है दिल मेरा कब से मानिंद सहरा के
मकाम है ये किसी का न किसी की गुज़र है कोई।

नज़र उठा कर जिधर देखो लाशें ही लाशें हैं,
ज़िंदा यहां रूह है न जिगर है कोई।

सब के सब चुप हैं ज़ुल्म पर जुल्म देखते हैं,
नज़रों में अब हमारी अमीर है न मोतबर है कोई।

~हिलाल हथ'रवी

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