रेत और वक़्त's image
Share0 Bookmarks 30 Reads0 Likes
टहलते हुए
समुन्दर किनारे पहुँचा
विशालकाय रेत की रियासत से
रुबरू हुआ.
अरसों तक पानी और सैलाबों से लड़ते झगड़ते
आखिर, 
पत्थर महीन सी रेत  बन गए थे. 

उस रेत के समुन्दर को देख
जहन में ख़याल आया...
इंसान को भी वक़्त 
इस रेत के समुन्दर सा लगता है,
कभी ख़त्म ही नही होगा
ऐसा हमेशा लगता है.
कोई वक़्त काटता है तो
कोई वक़्त गुज़ारता है,
रेत पर कोई दूर तक अकेला चलता है
या किसीका हाथ थामे चलता है.

मगर जब भी उस रेत को
मुठ्ठी में उठाओ 
और थामने की कोशिश करो,
तो वो वक़्त सा  हाथ से निकल जाता है.

पानी और दुनिया, एक जैसे ही है
एक तो धकेल देते है
या निगल लेते है,
वक़्त और रेत जब हाथ से
निकलने लगते है,
तो महसूस भी एक जैसा ही होता है. 
इन सब में,
मैं खुद को ढूँढता हूँ
जब जब मैं इस समुन्दर के नजारे
को देखता हूँ.

शहरयार नीरज

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts