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वो क्या गया कि रंगत-ए-बाग़ात भी गई

Shadab AhmadShadab Ahmad September 6, 2021
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क़िस्मत  से  मेरे  इश्क़  की  सौग़ात  भी  गई
वो  क्या  गया  कि   रंगत-ए-बाग़ात  भी  गई

मैंने अब अपने अश्कों को पत्थर बना  लिया
अब   तो  मिरे  नसीब  की  बरसात  भी  गई

अब दिल नहीं धड़कता उसे  देखने  के  बाद
सीने   से   मेरे   शिद्दत-ए-जज़्बात   भी   गई

मिलने को तो मिला वो मगर बे'रुख़ी के साथ
उस   दिन   से  आरज़ू-ए-मुलाक़ात  भी  गई

कब तक जलाये रखते हम उम्मीद का चराग़
दीदार-ए-माह   भी   न   हुआ  रात  भी  गई

इक रौशनी की चाह थी दिल को जला लिया
अब ज़िन्दगी से  वहशत-ए-ज़ुल्मात  भी  गई

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