ग़ज़ल's image
Share0 Bookmarks 43 Reads2 Likes

ज़िन्दगी ग़म को थका क्यों नहीं देती

तेरी याद भला मुझे दग़ा क्यों नहीं देती



दिए की रोशनी में हया चुभती है ग़र तुम्हें

इस बदन के वास्ते दिए बुझा क्यों नहीं देती


उभर आती है माथे पर शिक़न हालत की 

दूर जा रही हो मुझे बता क्यों

नहीं देती



गर्द-ए-ख़ुशबू ने की है जाँ तलब

मुझे मर जाने की दुआ क्यों नहीं देती


मुहब्बत के सारे क़ायदे तुमने ही सिखाए थे

गले के सारे निशाँ छिपा क्यों नहीं लेती



सुना है कोई और देख रहा है तुम्हें नज़र भर

मेरी लिक्खी बदन-ए-ग़ज़ल उसे दिखा क्यों नहीं देती



मैने तुम पर बड़े ज़ुल्म किए हैं

ये इल्ज़ाम भी सर मेरे लगा क्यों नहीं देती



मुझे मारना चाहती हो भला

मेरे हर ख़त को जला क्यों नहीं देती



क्या हो गए हैं उजाले भी ख़िलाफ मेरे

ये धूप मुझे अन्दर आने क्यों नहीं देती



हो न पाई इक ख्वाईश पूरी

ज़िन्दगी तू अपनी सज़ा सुना क्यों नहीं देती 




- सौरब ' अबीर '

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts