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प्रयास करो [एक प्रेरणा दायक कविता]

Saurabh SumanSaurabh Suman November 6, 2022
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१८ मात्राओं के चरण में लिखा एक सम मात्रिक छंद (विवरण नीचे है)


हुआ क्या कि आईं कुछ बाधाएं,

शंका-अंदेशा ने बास किया,

हुए विफल तो इसमें डर कैसा,

न लो संताप कि अप्रयास किया।


गिरे हो तो स्वयं उठना सीखो,

अंतः में अडिग एक आस भरो,

गिनो मत कितने कहाँ घाव लगे,

पुनः पुरजोर नया प्रयास करो।


स्वभाव कंकड़ियों की तीक्ष्ण हुईं,

कठोर चरणतल को बनाएंगे,

हुआ धूप तपन का सघन आलय,

तपा कुंदन तुल्य दमकाएंगे।


पड़ाव कई अभी भी हैं बाकी,

चले डगर पर बढ़ अब डिगो नहीं,

दुसाध्य श्रम ही सिद्धी का साधन,

विश्रामालय देख तुम थको नहीं।


न भूलो कि अद्भुत मानव हो तुम,

पयोधि पे सेतु जिसने मिता है,

महामानव मनु के हो वंशधर,

महाप्रलय को जिसने जिता है।


मिली विफलता इति में तो जानो,

अपूर्ण मार्ग अभी भी बाकी है,

हुए सफल तो फिर से कमर कसो,

कई कार्य शेष अभी बाकी है।


मेरे ज्ञान के अनुसार यह कोई परिभाषित छंद विधान नहीं है।

इस कविता को लिखने में मैंने निम्न नियमों का पालन किया है:

१. हरेक छंद में चार चरण

२. हरेक चरण में १८ मात्राएं

३. हरेक चरण का प्रारंभ लघु+दीर्घ

४. पहले तथा तीसरे चरण का अंत दीर्घ या लघु+लघु

५. दूसरे तथा चौथे चरण का अंत दीर्घ 

६. तुकांत दूसरे चरण का चौथे चरण से

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