वोट बैंक's image
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जनता खेतों में फसल उगाती है;
पर चुनावी दल इस जनता के सूखे पेट को
बनाते हैं उर्वर भूमि
पसलियों के खाद से!
और बो देते हैं मीठे वादे,
फिर सींचते हैं
निस्वार्थ भाषणों से लहलहाती फसल!
और जब ये हरी फसल पक जाती है
तो निकलने वाला अनाज
डाल दिया जाता है वोट बैंक में!
ओह पेट अब भी खाली है!

— सत्यव्रत रजक 

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