टूटती पगडंडियां's image
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मेरा संवाद अभी शेष,
मेरा अभिनय है विशेष;
मत रुठ कलम,
मत छूट कलम;
मैं इस नाटक का पात्र नया हूं,
मिट्टी के जल से भींगा गात्र नया हूं।

नहीं रिक्त हो सकती स्याही,
कलम तू ही मेरी सच्ची गवाही;
यह दुनिया कौन करेगी विश्वास,
बस करेंगे तो मध्य सड़क उपहास;
अभी तो जली थी आग चिंगारी,
अभी तो जगी थी हुंकार दिव्य कारी;
अब तो तुम्हें खरीदना भी मुश्किल,
तुम, वक्त की मार झेलती आजकल!
मैं चाहता था बनना भ्रामरी का शस्त्र,
ओ कलम, शब्द ही तो हैं मेरे शस्त्र।
तूं ऐसे समय में है रीती, 
लिखनी थी जब बात अबीती;
लिखना था इन टूटते गांव के प्रति,
विद्रोह : शहर की छांव के प्रति;
लिखना था- बदलती बैलगाड़ी, बसों में,
लिखना था- टूटती पगडंडी सड़कों मे;
लिखना था- सांझ बैलों की गुलेली,
लिखना था- सरसों की बाहें खेली;
खेत की पगडंडी शहर जा रही,
ओ कलम, क्या कुछ नहीं कर पा रही?
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01/11/2021







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