ताजमहल के प्रति's image
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जो पत्थर को तोड़ ताज' तन के तार पिरोता है,
आखिर उस श्रम का जग में मोल कहां होता है!
जिनने शिशु को सोता छोड़ गृह से था किया गमन,
उनको क्यों नहीं लिखता है ये इतिहास का मन।।

जिसने तन निचोड़ तरल कर ताज को संधान दिया,
फिर क्यों उन पीत पत्रों  में शाहजहां को मान दिया।
इस संसृति में इतिहास बस वैभव के  सुख गाता है,
और अकर्मण्य, विलास विकारों को भर उपजाता है।।

जन की पीड़ा कहां लिखी रे  इस म्लेच्छ वंश में,
लेखक सारे सडे़ मरे हैं शासन के संत्रास दंश में।
शासक की गोद में बैठ कलम ने इतिहास लिखा,
तभी अराजक, मादक,म्लेच्छ वाद का बास दिखा।।


— सत्यव्रत रजक

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