समृद्ध सदी का सच!'s image
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इन्हें इंसान कहें या सभ्यता की तरक्की,
भीख के कटोरों में आशुओं की चक्की।

तनु पर शत-वीभत्स मक्षिकाएं आकर,
लार चाट-चूस क्षुधा मिटातीं हैं,
कई मूषक दल के दल बसे हुए,
तिस पर चींटीं लग जातीं हैं।
मुंह फेर निकल जाते मुड़कर
कई समृद्ध सड़क-शहर । 
दो रोटी गिड़गिड़ा आशा से,
स्व निराहार शिशु देकर ।

मंचों पर कहते जिसे स्वतन्त्र,समृद्ध सदी है,
यहीं घनीभूत विस्मय सी जीवन की दुर्गति है।
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