समय के साथ's image
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एक शिला कई वर्ष तपी,
नव नदी-निर्झर से घिसी-पिसी
शत् भूकम्पों में थमीं कँपी।
गिरि अंक मही आतप सहती,
पीकर पीर मौन अधर रहती।

अस्तित्व लिए अब भी अकड़ी,
निष्प्राण भले ही धवल जड़ी।
पर जीवित है वह खिली कली
क्यों?
अरे! वह समय के साथ ढली।।


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