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रात हो गई;
रुको, अभी मत सोओ साथी!

पहले,
सुला दो उन सिंहों को,
जो दिवस भर भरे गरजते;
बैठे-बैठे जनता को,
जो गीदड़-श्वान समझते।



जिनको जाड़े भर शेष मृत्यु के-
कुछ भी नही सन्निकट साल;
उन पर जो तपित दृग भर-
कोप कठिन जिव्हा से करते खड़े सवाल।



क्यों, पलकें हो रहीं हैं भारी;
रुको, करो शब्द सृजन की तैयारी।

जो दम नहीं पीर पकी आवाज नज में;
वह सामर्थ्य अभी भी कलम और कागज में।
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✍️- सत्यव्रत रजक




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