पिता का पता's image
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जहाँ कविताएँ नि:शब्द हैं,
वहाँ मेरे पिता का पता है।

भरी लू में 
तपिश को ताना मार रहे मेरे पिताजी
तो कभी
घुटनों तक पेंट चढाए
बारिश को लौटा कर लौटे हैं घर।

मैंने देखी है 
पिता के चेहरे पर 
उनकी आँखों में 
कार्य पूर्ति के बाद 
संतोष की मुस्कान;
जो कि एक ताना है -
इस आराम की आबादी के लिए।

मेरे पिताजी ने मुझसे कहा कि
काम से मुँह बिचकाना 
गधे के पाँव छूना है
जिसके बदले में
सिर्फ लात ही खानी पड़ती है।

मेरे पिताजी
मैंने तुम्हें मेरे उठने से पहले
देखा है दिन का
आधा काम निपटाते हुए
ताकि किसी कार्य की छाया 
न छू सके मेरी देह।

मेरे सामने पिता ने जब भी
हँसना चाहा
हर बार अनुशासन आ गया आड़े
और आती हुई हँसी,
खुलती हुई बात,
घुलती हुई मिठास
दब गई सुर्ख गालों में
और सैनिक सी
तन गईं झुर्रियाँ।

मेरे पिताजी खुद के लिए
एक नोट के दो हिस्से करते
और मेरे लिए
दो नोट।

मेरे पिता 
जब आप अधेड़ को कुचलते
वृद्धता के पायदान पर पहुँचे
वास्तव में
तब मुझे दिखा
तुममें एक युवापन
जो दुनिया के 
सुस्तीवाद पर थूँकता है।

~ सत्यव्रत रजक



जहाँ कविताएँ नि:शब्द हैं,
वहाँ मेरे पिता का पता है।

भरी लू में 
तपिश को ताना मार रहे मेरे पिताजी
तो कभी
घुटनों तक पेंट चढाए
बारिश को लौटा कर लौटे हैं घर।

मैंने देखी है 
पिता के चेहरे पर 
उनकी आँखों में 
कार्य पूर्ति के बाद 
संतोष की मुस्कान;
जो कि एक ताना है -
इस आराम की आबादी के लिए।

मेरे पिताजी ने मुझसे कहा कि
काम से मुँह बिचकाना 
गधे के पाँव छूना है
जिसके बदले में
सिर्फ लात ही खानी पड़ती है।

मेरे पिताजी
मैंने तुम्हें मेरे उठने से पहले
देखा है दिन का
आधा काम निपटाते हुए
ताकि किसी कार्य की छाया 
न छू सके मेरी देह।

मेरे सामने पिता ने जब भी
हँसना चाहा
हर बार अनुशासन आ गया आड़े
और आती हुई हँसी,
खुलती हुई बात,
घुलती हुई मिठास
दब गई सुर्ख गालों में
और सैनिक सी
तन गईं झुर्रियाँ।

मेरे पिताजी खुद के लिए
एक नोट के दो हिस्से करते
और मेरे लिए
दो नोट।

मेरे पिता 
जब आप अधेड़ को कुचलते
वृद्धता के पायदान पर पहुँचे
वास्तव में
तब मुझे दिखा
तुममें एक युवापन
जो दुनिया के 
सुस्तीवाद पर थूँकता है।

~ सत्यव्रत रजक



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