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मुझे पहाड़ न बनाना!

सत्यव्रत रजकसत्यव्रत रजक February 24, 2022
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मुझे पहाड़ न बनाना!
पहाड़ को बैठे-बैठे ही
पूरा दिखता है
 गांवदूर-दूर तक।

मैं देख न पाऊंगा
अपना गांव रोता हुआ!
सह न पाऊंगा
लंगड़ाते खेत-खाई।

आह, रो पडूंगा मैं  
बन करुण निर्झर सा,
देख न पाऊंगा हाय
आदमी का पांव से गिरना।

देख न पाऊंगा
साहिब के हाथों से
 नमक बुरकना
रीढ़ की गली चोट पर।

अगर मुझे पहाड़ ही बनना है
तो ठीक है, मैं बनूंगा।
पर, एक शर्त है-
मैं गिर पड़ूंगा 
महाजनों के माथे पर
ताकि उनकी कुल्हाड़ी किसी
गरीब पर न गिरे;
किसी रोटी की रीढ चोटिल न हो।

- सत्यव्रत रजक

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