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मेरी नज़र में कविता

सत्यव्रत रजकसत्यव्रत रजक January 20, 2022
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कुछ लोग कविता को 
पेट पूर्ति का साधन मानते हैं;
कुछ लोग : साधना;
मैं कविता को मानता हूं :
पेट बांधकर सोने वालों को
 सहानुभूति का जरिया।
पर, समय-समय पर, 
इसे वह भीषण आग भी समझता हूं : 
जो बंद दरों से आने वाले 
हुक्मों और दहाडों को बुझाने में माहिर है,
यह आग केवल श्रमी-क्षुधातुरो में ही सुलगती है,
लेकिन मन में,
कभी कभार जब ज्वाला जिह्वा पर आ ही जाती
तब, समय की हवा कर देती गुमनाम,
और धूप के ओस कण -
आंच को आंसू दे विद्रोह को श्रद्धांजलि दे-देते;
 लेकिन समय-समय पर।
एक कलम की  कविता हो सकती है:
सुलगती आग-धुएं को धधकती काष्ठ।
और कभी हो सकती - 
राख होती जा रही काष्ठ को धृत। 

--

✍️ सत्यव्रत रजक

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