माटी का देवता's image
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निशीथ पयोद कर रहे भ्रमण,

कांस कर रहे थे बात;

चट्टानें सुन रहीं कहानी,

शुरू- अंत तक पूरी रात।


भीगता कृषक घराना औरों के खेत,

जलाते भींगी घास; 

दियासलाई तो छोड़ो,

जली नहीं कोई बांस।


हल्के छींटे पड़ रहे थे,

हवा कर रही थी त्रास;

सूदखोर घर खा चुके थे,

हरे किसान का सत्यानाश।


और कराहती जनी प्रसव से,

रोता अकुलाता इक बालक;

 कृषक भाग्य को कोसे अपने,

नभ को देखें फिर एकटक।


और रजाई में रोता सूदखोर,

सारे खेल का जयी खिलाड़ी;

समय-समय पर पान पत्र और

समय-समय पर पीता ताड़ी।


घुट-घुट कर मरती जनता,

सहमा माटी का देवता;

हर जगपाल की है यहीं पीर,

यह तो था बस एक यथा।

--

- ✍️ सत्यव्रत रजक

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