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मानव: नैसर्गिक नियमों का अपवाद

सत्यव्रत रजकसत्यव्रत रजक October 27, 2021
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मानव: नैसर्गिक नियमों का अपवाद


मृत होकर भी माटी की मटकी प्यास मिटाती है

लघु होकर भी गिलहरी सिंधु सेतु सजाती है।

और तिमिर भक्षण करती विपुल स्वर्ण सवारी,

निशीथ निहारिका लाती नीरव नव तारक थारी ।

मधु, ग्रीष्म,बरखा,शीत, पतझर बदलें बारहमासी,

नियति निमग्न नियम नैसर्गिक क्रम मय पूरन मासी।

केवल मनुज अपवाद गृह का ऐसा वह ही एक प्राणधर,

आलस्य, कार्य निज सुख,स्वस्वार्थ सिद्धि में जीवन भर।

और वह मनुज बुधित्व प्रबल होकर भी पछताता है,

कर पर कर रखकर बैठा आखिर हाथ क्या पाता है।

                  ★

  कवि सत्यव्रत रजक


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