मैं चिता का चांद हूं's image
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मैं चिता का चांद हूं:
रोज रात सुनता हूं 
कुछ खामोंश लगनें वाली :
चिल्लाहटे सांसें;
रोज रात भर देखता हूं-
इन कौतुक आंखों से
धधकती लाशें!

आग की अंगीठी पर
तपती कर्म की देह;
देखता हूं कराहता  शमशान
और भग्न होता सनेह।

सब जग शून्य हो जाता 
जब निशा के नेह में;
मैं अकेला चांद बर्बर,
जागता हूं हरेक गेह में।

देखता हूं : आदमी
कैसे चरमराकर राख हो जाता
देखता हूं : कर्म पथ
कैसे लड़खड़ा वीरान हो जाता।


देखता हूं हाथ रेखा
तपित होती जा रही धूमिल;
जिसके भरोसे बैठ वह-
 खोता था कुछ खालिस पल।



- सत्यव्रत रजक




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