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कवि तुम स्वमन स्वच्छंदी हो

सत्यव्रत रजकसत्यव्रत रजक December 28, 2021
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कवि तुम स्वमन स्वच्छंदी हो;
कलमों में न तो बन्दी हो।

साधक;
तुम वीणा वाणी के साधक,
हो सफल रागिनी के आराधक।
जीवन के यथा बिम्ब शक्ति हो,
कलम पत्र के तुम भक्ति हो।

'एक तरह से' छंद बंदी हो;
कवि तुम स्वमन स्वच्छंदी हो।।

कलाकार;
नीरव मन में राग जगाओ,
तम चिर घर आग उगाओ।
शंखनाद कर दो शब्दों का,
अटल शांति के प्रारब्धों का।

साधन गति के न मंदी हो;
कवि तुम स्वमन स्वच्छंदी हो।।

दीपक;
कवि तुम दीप अक्षय आंधी के,
घोर विपुल सम प्रलय समाधि के‌।
दीपक हो तुम उस उर तम का,
मेहनत के बलिदानों सम का।

तुम दृढ़ सत्यों के संगी हो;
कवि तुम स्वमन स्वच्छंदी हो।।

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