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कवि पिओ तुम होली हाला

सत्यव्रत रजकसत्यव्रत रजक November 22, 2021
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कवि पियों तुम होली हाला-
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मदिरालय में कितने प्याले,
कितने गोरे कितने काले,
रंगीनी हाला रंग डाले,
खनकेंगे बन एक प्याला;
कवि पियों तुम होली हाला।

जिनके नयनों बहें नीर,
जिनको हाला है अधीर,
हैं ढुलक रहे हिय अश्रु हीर,
आज़ रंगों अंतर पट जाला;
कवि पियों तुम होली हाला।

अगणित रंग भरे ये प्याले,
कई टूटे-फूटे, कई काले,
अंतर तल विश्वास जगाले,
मधु की जिनमें विघटित हाला;
कवि पियों तुम होली हाला।

बदल रहा हो दिवाकार, 
अब भी हाला हो स्वीकार,
मनु के असीमित दिव्याकार,
एक रंगी हो जग मधुशाला;
कवि पियों तुम होली हाला।

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