कंकालों के प्रति's image
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सिंह के सत्कार को आ रही मृगचंद्रिका,
और कंकालों के पेट थूंक ही तो तृप्ति है;
अस्थियों का धरा पर,
है अधि-विन्यास वास,
सिंह की श्वान समक्ष यहीं तो प्रवृत्ति है।

वे मरें,रोएं,गाएं, चीथड़ों में आह भर,
वे गुफा में हैं बिराजे, भण्डार भोज्य भित्ती है;
  है उन्ही के कर अलाव वे भून भी सकते हैं,
देते सिंह हवाले वेदों के- कि ये बात ऐसी-इत्ती है।


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