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जो सरहद को चला गया

सत्यव्रत रजकसत्यव्रत रजक December 28, 2021
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रोली का तिलक,
आंखों की चमक,
चालों की हिलती हुई तलब,
वह माथा जिसको चूंम लिया;
मां देख रही थी खादी अब,
जो सरहद को चला गया;
वह पुत्र प्राण से प्यारा था,
मैं मुझ को कहूं कुमाता क्या,
या खुद को कहूं बड़भागन अब।

ममता को सुला बिछोंने में,
मां बैठी झांके कौने में,
इक हृदय हमारा चला गया;
इस देश की राहें सोने में।

देती है दुआ आशीष भर,
करती है इबादत आठों पहर,
हे लाल मेरा खुशहाल रहे,
रोती है नित आंखें झर-झर‌।


- सत्यव्रत रजक

27/11/2021






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