जग ही जाने's image
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विष सूंघ सौ सर्प यहां मारे जाते हैं,
चूहे काल हलाहल पी इठलाते हैं;
पंछी रेंग रहे हैं रेगिस्तानों में,
मकर-व्याधि नभ में उड़ इतराते हैं। 


आज भरी पूनम में घनी घोर कृष्णिका है,
निष्कपट सगा बंधु असि पक्ष बिका है;
भरे बसंत में तरु तन पत्ते झड़ जाते हैं,
अरे खड़े आषाढ़ में पानी नहीं लिखा है।


जाने यह जग क्या वस्त्र बुन रहा है,

निज कुल संहारण को अस्त्र गुन रहा है; 

देवता कानों से बहरा गए हैं सभा में,

यहां हर आदमी की कौन जाने सुन रहा है।

- सत्यव्रत रजक

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