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हिरोशिमा का पतन-

आसमान से क्या आया-
अनजान क्षितिज
पल ढ़ेर हुआ।
उठी आग प्रलय पुंज
भू थी हिली-बिथली
देख व्योम थरथराया;
तब्दील राख मौत-मौत,
यह प्रलयाग्नि पीतारुण-
फिर श्यामांत क्षण।
ज्वाल उठी गगन
क्षिति भीषण रोयी,
छिन्नानेक विछल शव
तल मलवा तब्दील,
मृत्यु का जहर घुला
क्षण लुटा शहर।

यह मनुज का सृजन था
मनु के लिए
मनु को समर्पित
मौत का।

यह दावानल है-
फटी फूटती जग चिंगारी।
अलविदा सभ्यतावासी
सोओ अब निज कृत्यों की
उपजी सुस्ती में।

यह सोए सहस्त्र उरों वाला;
था हिरोशिमा,
अब कुचला जगत के
भार से।
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08/09/2020

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