हे राम!'s image
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देखो, देवता रखते कदम
 आ रहा निमग्न अभय से;
सुर्ख कपोल जीर्ण निबोल,
 अमित उर बोल उभय से।

यह सभा संकल्प थी
सम्भाषण शांति सदय की
निर्भय की लय की
 जन गण जनता जय की।

एक अल्प त्वचा वदन सजा
 पतझड़ सा निर्भीक मन।
यह देव रथ में शोभित नहीं,
 चल रहा मृदा में रख तन।

देखो, सौ माथ टिक रहे 
 देव के फटे मिटे चरण में; 
कई अनुयायी अनुगामी
 आगन्तुक गिरे शरण में।

वह गम्भीर देवात्म 
कुल मंजुल भारत का भार;
जनता का स्वर सत्य,
 अक्षुण्ण राष्ट्र का वर आभार।

भरी भीड़ जनता की
 या सम दौड़ धूप की आंधी;
इसी मध्य बढ़ रहे सभा में,
संध्या, शिष्याओं सह गांधी।

कोई नाथू क्षुब्ध महात्मा से
 हो सभा मध्य आया था;
अभिवादन कर बापू से
अकल्पित मन लाया था।

अरे यह क्या भक्त ही ने 
ईश को कर दिया खंडित;
आह यह क्या पाप रे,
 हो गया, हो गया अहित।

इसी मनुज ने ज्वलित कर दीं
 वक्ष पर गोलियां अविराम,
और महात्मा कह गया 
अधरों से अंतिम 'हे राम'।

मैं नाथू के सह जोड़ राम,
 राम की मर्यादा नहीं खो सकता; 
एक पुण्यात्मा का संहारक
 कभी कोई राम नहीं हो सकता।

- सत्यव्रत रजक

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