गुरूजी !'s image
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श्री सत्ययथार्थबकाचार्य गुरूजी बगल वाले कमरे में रहते हैं। भला एक पड़ोसी से बढ़िया उसे कौन जान सकता‌। 
वे मौके की तलाश में रहते हैं । विद्वानों के कान काटने का उनमें महान हुनर है। जो हुनर आजकल लगभग विलुप्त प्राय सूची में शामिल हैं। इस हुनर की छाया अच्छे-अच्छे माथा टेकते हैं।
 गुरूजी को भागवत का विशेष ज्ञान था। ये न तो कभी काशी-हरिद्वार गए न ही मथुरा-वृंदावन फिर भी वे अच्छे-अच्छों के कान कतरने में मशहूर थे।‌ वे ही जाने उन्होंने यह पावन कौशल कहां से हासिल किया, शायद पेट से। 

चलो एक उनका परम तेजस्वता का बखान सुनाते हैं :

एक बार विद्वानों की सभा में बहस छिड़ गई। गुरूजी का कहना है कि रावण ने राम को मारा जबकि अन्य का मानना विपरीत था। 
जब बात प्रमाण देने पर आ जाती है तब गुरुजी ने बांच दिया - फलाने वेद के ढिकाने श्लोक में और तो और पृष्ठ संख्या भी ठोक दी।
अन्य मनीषियों के सामने प्रमाण के लिए तुलसी कृत रामचरितमानस आई।
 जब बाजी पलटने लगी तो गुरूजी ने कहा "हे ज्ञानी पहले आप ये बताएं कि रामचरितमानस पहले रची गयी या वेद।" उनके मुंह से सृष्टि का गंभीर चिंतन और यथार्थपन चुचा रही था जो स्वभाविक था!
"वेद पहले"

सभा सन्न थी। गौरतलब है कि किसीने भी वेद नहीं झांका था!
वेदों पर महंगाई है; और किसी की भी वेद खरीदने की हिम्मत नहीं पटती थी, पढना तो दूर की बात।
वास्तव में गुरुजी की बात में दम था। सब आवाक रह गए।

 गुरुजी ने वेद पढ़ने को तो छोड़ो चारों वेदों का नाम भी नहीं सीखा था सिवाय इकाध वेद के। यह जगत का दुर्लभ और संकटापन्न गूढ़ रहस्य था जो वह और मैं जानता हूं!

— सत्यव्रत रजक

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