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ग्राम्य भारत
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भले शक्ल से नग्न,
चीथड़ों-चिथड़ों में भग्न;
जर्जर घरों-घाम में,
टूटे समय की शाम में,
खिले चहरों में मग्न।
इन्हें है नहीं लोलुप,
शहर की सभ्यता से,
न वहां के ठाठ-पता से।
यहीं है देश,
यहीं है वेश,
यहीं संस्कृति,
स्वर्णिम अति।
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20/08/2021

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