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एक अंतिम जीवन
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मानव बना 'मानव' तो श्रेय था जिसका सघन,
नीव में जिसका पसीना, तब बना था यह भवन।
आज उनके कर कुतरते, क्या, नहीं आती शरम,
कर्म आलिंगन रहा जो, हो दिवस भीषण गरम।।
                
                 आजीवन निर्झरों सा जो सतत था,
                                                   रुक गया;

यह अनय है, वेदना है और अन्तर्युध्द है,
हो रहा असह जीवन, मनु व्यथा से क्षुब्ध है।
आह भर जो रो नहीं सकता पाषाण हृदय मन,
गिर पड़ा होगा 'अपाहिज', किंकर्तव्यविमूढ़ जीवन।।
                
  बाढ़ों में भी नहीं झुका, जीवन दर्शन से-
                                                झुक गया।

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03/08/2021

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