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डल झील - 
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त्रिदिशि-दिशि हिमगिरिणि
से घिरी,
उन्हीं अचल से सही समीर सरसी
पय फिरी।
खिले अरविन्द-कुमुदिनी तट
शैवाल सुनहरी,
उठी प्रतीर वनस्पति,डल 
हरी-भरी।।१।।


देख दृष्टा मंजुल दृश्य
विस्मित मन,
झील ने ओढ़ा हुआ हो
नील-नवल वसन।
चीरती व्योम को पड़ती जहां
नव प्रभात किरण,
जल उषा अर्चि टकराकर होति
ज्योति जनन।।२।।


जहां ईश ने बरसाया हो आशीष से
ऐश्वर्य सुखद नूर,
सौन्दर्य को यहां शब्द नहीं,
नीर विमल दूर-दूर।
उषा स्निग्ध, सांध्य स्तब्ध,
रम्य क्षितिज, 
निशि तारों से खाती हो झी'
त्रास निज।।३।।

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