बीच शहर में मेरा गांव's image
Nepali PoetryPoetry1 min read

बीच शहर में मेरा गांव

सत्यव्रत रजकसत्यव्रत रजक January 24, 2022
Share1 Bookmarks 267 Reads2 Likes

मेरे गांव के लोग
बढ चलते शहर को
अखबार बांटने,
वे अखबार जो बस
शहर की राजनीति में
उलझे हुए हैं।

इस गांव आना चाहोगे!
शहर का नक्शा देख लेना;
जो हरे पेड़ों से ढंका
वितान है,
वहीं तो मेरा गांव है।

मेरा गांव मर जाएगा,
दो दिवस और इसे देखलो!
शहर की छांव बढ़ती आ रही,
मेरा गांव ढहता जा रहा है।

एक सड़क आ चुकी,
रात की नींद उड़ चुकी;
पगडंडियां सुनसान होतीं जा रहीं,
व्यस्तता का ताप सड़कों पर बढा है।
अब बैलों की गोई -
यंत्रों में बदल गई;
बैलगाड़ियां -
दौडते इंजनों में बदल चुकी;
आह! मेरा गांव शहर में न बदल जाए।
-
- सत्यव्रत रजक

#स्वरचित_पंक्तियां

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts