बबूल सौंदर्य's image
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ऐरे बबूल के पेड़
उगा ये कुसुम,
जग का खुद ही-
परिहास बताते तुम।
शूलों को ढंक दिखा रहे
कह, मैं सौन्दर्य श्रेष्ठ,
संसार ने भी माना-
पीठ को ही सदा ज्येष्ठ।
अरे बबूल व्यर्थ मद में ही
तुम इतरा रहे हो,
क्या शूलों के फूलों में सौन्दर्य
तुम बिखरा रहे हो।
सच ये सौन्दर्य नहीं
सभ्यता पर व्यंग्य है,
शूलों पर तम वितान
सौन्दर्य तो नगण्य है।
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