आदिछन्द's image
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आतप अन्ते अति वक्ताकुल,

थे आदिकवि तट तमसा प्राकुल।

नियति के झिलमिल गात्राम्बर,

देख हिय पुलकित अति मुनिवर।

थे हरिभि रुधिरमय शैलारण्य,

क्षितिज अधर रक्त,अभय वन्य।

था बसंतोत्तर,अर्कोत्तर,झीनी समीराश्रय,

कोलाहल खग दल अन्तरमर्मी विजय।

बन वीणा उद्भित मन्द सरित स्वर,

पल उच्च गूंज मुनि मधुपूरित उर।

ज्यों क्रोंच युगल तट कल्लोलित,

भय नयन मूंद मुनि अधि प्रफुल्लित।

कर रहे युगल प्रेमोद्भित पल,

थे प्रेमानन्द रंजित सजल।

सहलाते थे पांखे आपस,

लोट धूरि थे उगते वापस।

मानों जग प्रणय अभिनन्दित,

मुनि कण्ठ उदित भय आनन्दित।

पल शर छूट, लगा अंतर नर क्रोंच,

मुनि थे देख रहे स्तब्ध सोच।

करुणसिन्धु में साधु प्लवित,

देख निषादाखेटक कवि क्षोभित।

करुणालय से निकले स्वर,

उठा क्षुब्धित,व्यथित उर।

कर जल मंत्रोच्चारित जाप,

दिया कठिन कवि ने अभिशाप-

"मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्र्वती समा।

यत् क्रोंच मिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।"

जब स्थिरचित हुए मुनि,

सोच रहे वे शबद पुनि।

सृजिन प्रथम श्लोकानन्द,

त्यों आदिकवि का आदिछन्द।।


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दिनांक- 27/04/2021 

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