अबनी का अभिनेता's image
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स्त्री, बाल-बालाओं सह-

जलता अबनी का अभिनेता;

पर श्वेद : शांति शीतलता बन-

विश्राम अग्नि को दे देता।


दोपहर : धधकती लू-लपट,

अंतर धधकती क्षुधा अनल;

उदर पूर्ति सह कुल कांति को-

उठा लेता हाथ हशिया-हल।


तृण-चारे से गढ़ी झोपड़ी-

उसे समझता कंचन-सोना;

कहां सहज है उस मानुस को-

मखमल से बिस्तर का होना।


हां, खेत वहीं जिसके श्रृंगार में

कर देता कई अर्पित कल-आज

हाय, हृदय फट पड़ता है जब

उठ औरों के घर जाता नाज।


कांटे, धूल, धूप, धूम्र भर

अपनी पीड़ा कहां रे जानी,

बिना निवाले मारे जाते 

निरपराध दो बाल प्रानी।


जितने की होती ही नहीं,

सब तिल, ज्वार, गेहूं, अरहर

जितनी मोटी हो जाती है

साहब के ब्याजों की दर।

- सत्यव्रत रजक

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