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जिंदगी का नहीं कोई ठिकाना।

प्यार की धुन वहीं फिर गुनगुना ना।


क्या नशा था हमें, कैसे थे हम भी,

याद अब आ रहा गुजरा जमाना।


फ़िक्र कुछ भी नहीं, थे मस्तमौला,,

बारिशों में उछलकर, उफ़ नहाना।


रेडियो में चले जो गीत कोई,

संग उस गीत के खुद सुर मिलाना।


खेलने के सिवा कुछ भी न भाता,

मां के डर से सिखा, खाना बनाना।


याद है वो जलेबी छील खाना,

आम के पेड़ पर घंटों बिताना।


खेल में की लड़ाई दोस्तों से,

दूसरे दिन सभी झगड़े भुलाना।


आज़ सब लोग हैं अपने पराए,

भूल बैठे सभी रिश्ते निभाना।


दर्द सदियों जमा रहता ह दिल में,

देखिए कर्ज कितना है चुकाना।


काश बचपन में ही रहते हमेशा,

ज़ख्म देता है कितने ये ज़माना।


✍️ सरिता








       

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