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तू परछाई है मेरी, तो कभी मुझे भी दिखाई दिया कर

ऐ जिंदगी ! कभी तो इक जाम फुर्सत में मेरे संग पिया कर


मै भी इन्सान हूँ, मेरे भी दिल में बसता है खुदा

मेरी नहीं तो न सही, कम से कम उसकी तो क़द्र किया कर


इनायत समझ कर तुझको अबतलक जीता रहा हूँ मै

मिटा कर क़ज़ा के फासले, मै तुझमे जियूं तू मुझमे जिया कर


मेरा क्या है ? मै तो दीवाना हूँ इश्क-ऐ-वतन में फनाह हो जाऊंगा

वतन पे मिटने वालों की न जोर आजमाइश लिया कर

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