सादगी's image
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कर दो दूर इन चरागों को
अब अंधेरे पसंद हैं मुझे
इकलौता होगा वो चांद मगर
अब तारे पसंद हैं मुझे

कह दो इन हवाओं से
अब सन्नाटे पसंद हैं मुझे
फूलों का भी कुसूर है क्या
अब कांटे पसंद हैं मुझे

फीकी हैं रंगत सेवरों की
अब रातें पसंद हैं मुझे
जो मेरी तन्हाइयों ने कहीं
वो बातें पसंद हैं मुझे

खोल दीं अब बेड़ियों सारी
मेरी आज़ादगी पसंद है मुझे
जचते नहीं ये श्रृंगार मुझ पे
मेरी सादगी पसंद है मुझे 

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