गुरूर's image
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तू जो ये इतराता है अपनी हैसियत पर
सुन! टूट जाते हैं ये गुरूर एक वक्त पर

ठुकरा कर मुझे जो गुमान कर रहा है अपने रुतबे पर
चकना चूर हो जाते हैं ये रुतबे अकेले पड़ने पर

गैरों के लिए तू मेरे जिस लहज़े से भाग रहा है
न जाने कितनों ने दिल हारे हैं इस लहज़े पर

चंद दिनों में जो ये मिजाज़ तेरा बदल गया है
कोई वजह है या फिदा है किसी तासीर पर

तू जो दुनिया की नज़रों में होशियार बना फिरता है
तरस आता है मुझे तेरी इस नादानी पर

बन जा तू ऊंचाइयों का बादल क्यूं ना
मगर छांव तो मिलती है बस इस ज़मीन पर
 

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