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Romantic PoetryPoetry1 min read

जागता रहता हूँ देरतक नज़रे बिछाये

Sanjay LadeSanjay Lade February 5, 2022
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जागता रहता हूँ देरतक नज़रे बिछाये

कोई आके मेरी नींदोंसे सपने न चुराये

 

अपनी ही मर्ज़ी के मालिक है हम

है राते अनोखी और दिन भी निराले

 

ज़रुरत न पड़ी दुष्मनोकी कभी

कई साँप हमने आस्तीनों में पाले

 

एक एक निग़ाह में है सौ सौ बाते

कहाँतक कोई अपने दिल को सम्हाले

 

शहर में थोड़ी धुंद है आशिक मिज़ाज

हम भी अपनी हस्ती को थोड़ा भीगा ले






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