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गाँव की लड़कियाँ

Sanjay HrishuSanjay Hrishu April 3, 2022
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गाँव की लड़कियाँ जब भी प्रेम करती है

वो प्रेम मात्र नहीं होता है

उसमे होता है

ललकार - समाज को

दुत्कार - रिवाज को

बगावत - परिवार से 


जब वो बड़ी हो रही होती है 

वो भी घूमना चाहती है 

अपने गाँव से दूर 

किसी अनजान शहर में 

किसी अपने के साथ। 


वो भी चाहती है खत लिखना 

किसी को बगैर बताये 

और चाहती है कि 

पन्नों में ओझल पत्र 

ठिकाने पर पहुँच जाये। 


वो भी प्रेम करना चाहती है 

स्वच्छंद अरमानों के साथ 

बिना अपमान सहे, दुत्कार सहे 

और सुनाना चाहती है किस्से 

मिलने के, बिखरने के।


 कमजोर नहीं होती है 

नाजुक भी नहीं होती, 

बस कुछ करती नहीं

क्यूँकि जानती है वो - 

मालिक कमज़ोर दिल के है 

और एक लड़की कि आजादी 

उफ्फ्फ, मर्दानगी पे धब्बा होगा। 



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