तल्ख़'s image
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नायाब है ज़िन्दगी जानता है ये
पर कभी कभी खोना चाहता है ये
शांत स्थिर है ये पर
अक्सर विचलित भी है ये
उड़ना चाहता है खुले आसमां में ये
पर चाहता है कोई डोर भी ये
शरर, सोच की रोकना चाहता है ये
पर कभी कभी ताप में जलना चाहता है ये
क्या ग़लत क्या सही 
शायद
सब ग़लत सब सही
ग़ालिबन, जीस्त के लिए तल्ख़ तो है ये
पर कभी कभी ऐसी तल्खी चाहता है ये

 


 









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