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आफ़ताब को मुट्ठी में बाँधने

sandysoilsandysoil June 16, 2020
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न भीड़ है पीछे, न क़ाफ़िले हैं जुड़े,

अकेला ही करता हूँ मैं, ये सफ़र-ए-ज़िंदगी।

आफ़ताब को मुट्ठी में बाँधने निकले हैं जो,

ज़िंदगी के सफ़र में अक्सर अकेले ही दिखते हैं वो।


-संदीप गुप्ता SandySoil

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