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ये धरती है मेरा मान ।

ये दिलाती है मुझे सम्मान।

पेशे से एक किसान हूँ।

दिन रात मेहनत करता हूँ।

इस माटी में बीज बोता हूँ;

जिस में बसती है मेरी जान।

सिंचाई इसकी करता हूँ।

खाद इसे देता हूँ।

पसीना अपना बहाता हूँ।

खेतों में उगती फसल ही है मेरी पहचान।

पढा-लिखा कम हूँ।

पर मौसम की मनोदशा समझता हूँ।

पेट सबका भर पाता हूँ।

इसमें ही है मेरी शान।

छोटे से मकान में रहता हूँ।

खेत के बीच मचान पर सोता हूँ।

खेतों की रक्षा करता हूँ।

झूमें मेरे खेत-खलिहान,

जब उगता सुनहरा धान।

बिनति इतनी करता हूँ;

सुख-दुख में साथ चाहता हूँ। 

सोचो क्या होगा अगर ना रहे किसान?

उन्हें करता हूँ दिल से सलाम;

जो कह गये 'जय जवान, जय किसान'।

सम्रिता®

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