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मेरे हृदय के मध्य में उठी लहर तुम हो,
मेरे लिए तो जाड़े की वो दोपहर तुम हो,,
जो दिल को सींचती हो तुम उतर के आंखों में,
क्या दिल के खेत में उतरी हुई नहर तुम हो,,

हो मेरे पास तो मुझको यूं खास लगता है,
की फूल और गुलिस्तों का एक शहर तुम हो,,
हूं तुमसे दूर मैं तब भी तो खास लगता है,
हूं सलामत मैं जिसमें घुलके वो ज़हर तुम हो,,

समरेन्द्र उपाध्याय

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