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वो नास्तिक था,
उसे ऊपर वाले पर ऐतबार नहीं था,
वो नहीं मानता था इन धर्मो, रीति रिवाजों और उस ऊपर रहने वाले ईश्वर/अल्लाह/भगवान को,
मगर उसने किसी से प्रेम किया,
उसने प्रेम किया ये जानते हुए भी कि जिसे वो प्रेम कर रहा है,
वो आस्तिक है,उसे उस ऊपर वाले पर भरोसा है,
वो आस्तिकता रखता है उस ईश्वर/अल्लाह/भगवान के वजूद में,
उसने भी उसे प्रेम किया,
उस प्रेम को जिया
और उम्मीद की,कि उसके प्रेमी की नास्तिकता आस्तिकता में बदल जाए, मगर ऐसा नहीं हुआ उसने अपनी नास्तिकता को आस्तिकता में नहीं बदला,
और उस आस्तिकता रखने वाले ने अपना प्रेम खो दिया,
वो आस्तिक आज भी आस्तिक है।
मगर प्रेम में अब उसकी आस्तिकता,उसके लिए धीरे धीरे नास्तिकता में बदल रही है,
अब उसकी आस्तिकता प्रेम पर अपना वजूद खो रही है।
और फिर एक नास्तिक नास्तिक होते हुए भी प्रेम में आस्तिक बन गया,और दूसरा आस्तिक होते हुए भी प्रेम में नास्तिक बन गया।
©-Salma Malik
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