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"लिखना"

आज कोई कविता नहीं लिखी,
आज कोई ग़ज़ल नहीं कही,
आज कोई शेर मुकम्मल न हुआ,
तो सोचा कुछ तो लिखूँ जो "लिखा" कहलाए,
जिसे तुम पढ़ सको और कहो कि हाँ कुछ तो बात है तुम्हारे लिखे में,
मगर क्या कुछ भी लिख देना,
असल में लिखना है?
या तुम्हारा कुछ भी पढ़ लेना असल में पढ़ लेना है?
तो जवाब शायद तुम और मैं दोनों बेहतर जानते है,
कि कुछ भी लिखना "लिखना" नहीं है,
कुछ भी पढ़ना "पढ़ना" नहीं है।
तो फिर ऐसा क्या किया जाए कि
कोई ग़ज़ल,कोई शेर या कोई कविता बन जाए,
जब कोई जवाब न मिला तो ये जवाब मिला कि चार्ल्स बुकोव्स्की ने सही कहा था कि 
"मत लिखो अगर फूट के न निकले,
बिना किसी वजह के मत लिखो।"
मगर ये सब लिखते लिखते
मैंने पाया कि खुद से बातो करो,
जब कोई बात न बने,
ख़ुद के लिए लिख दो कुछ,
जब कोई अशआर न बने।
और ख़ुद के लिए लिखतें लिखतें
जब तुम्हारी कविता बनने लगे
समाज के लिए लिखी कविता 
तो तुम समझ जाओगे,
कि लिखना असल में तब लिखना है 
जब तुम ख़ुद से सैर करते हुए 
दुनिया की सैर पर पहुँच जाओ,
और जिस दिन ऐसा होगा,
तुम समझ जाओगे,
कि तुमने "लिख"दिया 
कोई शेर,
कोई ग़ज़ल 
या फिर कोई कविता।

©- सलमा मलिक
19 January 2023

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