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अरमां हुए गुलज़ार, बेसब्री भरी रात थी।।

मेरी महबूब से वो,पहली मुलाकात थी।।

फूल खिले गुलसन में,खुशबू भी साथ थी।।

हवाओं में भी उस दिन,कुछ अलग बात थी।।

घनघोर अमावस में भी,खिली चाँदनी रात थी।।

नजरों-नजरों में ही बस,हमने करी बात थी।।

चाट की दुकान पर,मीठी लगी चाट थी।।

गरमी के दिनों की वो,अलग ठंडी रात थी।।

चाँद की चमक को भी,उसकी सौगात थी।।

मेरी महबूब से वो, पहली मुलाकात थी।।

               ----- सलिल पन्त

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