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Kavishala DailyPoetry1 min read

वक्त का परिंदा

Sahdeo SinghSahdeo Singh April 20, 2022
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वक्त का ये परिंदा रुका है कहां

यह तो उड़ता रहा है यहां और वहां,

छोड़ गांव उड़कर पहुंचा शहर में यहां,

कोई अपना नहीं अजनबी हैं यहां,

कोई ठौर ठिकाना कैसे होगा गुजर,

रोटी कमाने को आया इस अजनबी

शहर,

उड़ते उड़ते परिंदा बैठा एक मुंडेर,

लेकर डंडा भगाया ना दिया कोई ठौर,

मन में सोचता रहा मां का आंचल छूटा

प्यार का अमृत प्याला यहां पर लूटा,

अब तो कोई नहीं है सहारा यहां,

अकेला ही जीने का सहारा ना मिला,

हौसला मन में अपना बनाना जहां,

इस मिट्टी से मिलेगी मंजिल जवां,

अब तो उड़ना है सारा खुला आसमान,

मेरी किस्मत की गठरी ये जमीन आसमान ।।

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