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Kavishala DailyPoetry1 min read

खिसकती दीवारें

Sahdeo SinghSahdeo Singh May 31, 2022
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जो दीवारें हमारे समाज की मजबूती से जुड़ी थी,

अब उनकी एक एक ईंटें खिसक रही हैं,

प्रेम और सौहार्द्र की हमारी परंपरा,

में एक खाई खुद रही है,

हमारी तहजीब जो मिसाल थी ,

सामाजिक ताने बाने की आज उसकी,

एक एक जोड़ की ईंटें निकल रही है ।

इस देश की अस्मिता हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति,

आज क्यों हमारी नींव नफरत से बिखर रही है ।।

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