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“कलम कुछ बोल”

कलम आज कुछ तो बोल,

जिनके चेहरे पर है खामोशी,

भूख गरीबी में भरी उदासी,

इनके दर्द की दास्ताँ तोल,

कलम आज कुछ तो बोल ।

अन्धों की इस सूनी बस्ती में,

जिन्दगी की मिटती हस्ती में,

अन्धों बहरों के शहर नगर में,

इनके ढोल की खोल तू पोल,

कलम आज कुछ तो बोल ।।

जिनके हाथों में है सत्ता ,

जाति धर्म का खेले पत्ता,

मजहब और सियासत में ऊलझे,

खोल उनके लोकतंत्र की पोल,

कलम आज कुछ तो बोल ।।

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