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चलते चलते हम कहां पहुंच गए

भूल गए खुद को दीवाना हो गए

अपने बुने हुए जाल में उलझ गए हम सब

आधुनिकता के बहाव में मर्यादा भूल गए,

अपनी विरासत छोड़ हम नकल पर आ गए

संस्कृति और संस्कार से दूर हो गए

एक अंधी दौड़ में मशगूल हैं हम सब

की इंसानियत के हर तार को तार तार कर गए ।।

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