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भूल जाते हैं अपने मुफलिसी के दिन

आज सफलता की चकाचौंध पर इतराते हैं,

एक इंसान मसीहा बनकर हाथ बढ़ाया

आज उसको भूल जाते हैं,

कर्ज के बोझ से जब दबे थे तो एक एक

पल जिंदगी भारी लगती थी,

किसी ने हाथ बढ़ाकर सहारा दिया,

उसके अहसानों को भूल जाते हैं ।

आज आपके कदमों पर जन्नत झुकी

कल क्या होगा आपको ज्ञात नहीं,

कृतघ्नता का मोल चुकाना पड़ता है

वक्त हर कर्म का हिसाब रखता है ।।

नोट: यह कविता मैने बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति के लिए लिखी है जिनको हमारे ही एक भाई ने संभाला था आज उसके किए हुए एहसानों को भूल बैठे हैं ।।

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